कली सुनो सकुचाओ मत यह जान लो
कली सुनो सकुचाओ मत यह जान लो ।
लोलुप भ्रमर नही हूँ कोई मान लो ।
तूम मकरन्द लुटाओ जैसे जीवन तेरा निभाओ जैसे ।
सरम दिखा भय भ्रमित परोसो बहुत गलत है जान लो ।
कली सुनो सकुचाओ मत यह जान लो ।।
किसी फूल का रहा लाडला निश-दिन मेरा बसेरा ।
रस-मकरन्द -महक मे चहुँ दिस
होता मेरा फेरा ।
कोयल का कलरव मै सुनता शीत
पवन के छोके ।
तितली जैसी पंखुरियो ने छुवनो से है घेरा ।
आया हूँ बन अतिथि तुम्हरा मान लो ।
कली सुनो सकुचाओ मत यह जान लो ।।
अभी नही पतझड को देखी अभी नही परिवर्तन को ।
धूप-छाह न ओस सही हो न प्रसून के नर्तन को ।
अभी नही डाली से टूटी नही तितलियाँ तुमसे रूठी ।
अभी तो तुझमे सब संचित है सुनी हो केवल कीर्तन को ।
मदमाती मदहोस हुई हो व्यय का थोडा ज्ञान लो ।
कली सुनो सकुचाओ मत यह जान लो ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र
Punam verma
13-Apr-2023 09:06 AM
Very nice
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Abhinav ji
13-Apr-2023 08:22 AM
Very nice 👍
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Shashank मणि Yadava 'सनम'
13-Apr-2023 06:23 AM
बहुत खूबसूरत भाव
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